मंगलवार, 20 मई 2014

आकृतियों की टेलीपैथी


16 May 2014
06:59

-इंदु बाला सिंह

भोर की
चाय खत्म होते होते
दबे पांव
कितने सारे चरित्र
दबे पांव एक एक कर आ जाते हैं
सामने
और
खड़े हो जाते हैं
वे मौन 
मेरे सामने ........
बरामदे के फैले कुहासे से 
उभरती हुयी
आकृतियों से से एक अजीब सी 
एक टेलीपैथी 
महसूस होने लगती  है......
कलम 
उकेरने लगती है 
पन्ने पर 
मनोभाव |

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