1978
हर पल कुछ छूट
रहा
मुट्ठी से
बालू सा कुछ फिसल रहा
क्या मिटना ही
तेरी नियति है ?
ओ !
शक्तिपुंज
स्नेहवत्सला हो कर भी
दीन हीन
ही कहलाना तेरी उपलब्द्धि है ?
घबरा न
जलती बुझती
बिजली के लट्टुओं सी तू
आश्रितों को
रोशनी दिखाती जा रही तेरी काया लायेगी परिवर्तन
देखना एक दिन
हिम्मत न
हारना कभी तू |
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