27.08.96
तुम मेरे
शत्रु नहीं मित्र हो
जगाया है
तुमने
मेरी सुप्त
चेतना को
झिंझोड़ा है
तुमने मुझे
बनी हूँ आज
फौलाद
भीषण झंझावत
में झूलता मन
देखो सहनशील
बना है
जब
जब हारा है मैंने युद्ध
समेटा है अपनी
सेना
और जगाया है
आत्मविश्वास निज में
खुद ही मलहम
लगाया है अपने घावों पर
आगे घोड़े
दौड़े हैं सदा
कामना करो
मित्र
हारे न मेरा
सत्य कभी |
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