क्या
बांधेगा हमें कोई
इतने स्वार्थी
बन चुके हम स्वावलंबन के नाम पे
सारे कानून रख
चुके हम ताक पे
आज हम साधू हो
चले
रक्त
सम्बन्ध भूल चले अब
हम कहानियों
में पढ़ते
कर्मवती ने
भेजी थी राखी थी किसी को
इतिहास क्या
याद रखें हम
हमें फुर्सत
नहीं |
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