1998
नियति
का क्रूर अट्टहास हो तुम ? ..
पूछो
न यह प्रश्न
आज
तुम स्वयं से ...
न कहना देखो
....
मेरा क्या दोष
?...
त्रास की इस
बेला में
मन में उठता
है एक प्रश्न ...
क्या सत्य का
दीप उजाला नहीं करता ?....
जलने दो इस
दीप को
अन्यथा असत्य
का अंधकार लील जायेगा
अजगर सा समूचे
विश्व को |....
अब कोई
प्रश्नोत्तर नहीं ...
देखो जुगनू सा
टिमटिमाता है मन
जुगनू की चमक
से
गरमा उठेगा घर
|
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