कर्म करने के
बाद भी
जब न मिले फल
तब मन
नास्तिक होने लगता है
क्योंकि अपनी
भुजाओं पर
विश्वास है
मुझे
कल हम हो न
हों
पर आज तो
अपना है न
मन करता है
जल्दी जल्दी पत्ते समेटूं अब
खेल समेटने
में भी तो लगता समय
कल किसने
देखा है
हम हों न हों
रह जायेगी
हमारी निशानियाँ
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