सुनी थी
मैंने
अपनों से
अकेली की अजब
कहानी
वह मालकिन के
घर कपड़े धोती और बर्तन मांजती थी
मालकिन से
खाना मिलता था
अपने बेटे व
बेटी का पेट भरती थी
दिन बीते
वर्ष बीते
लड़का खाड़ी देश
गया
कमा कर लाया
धन
मालकिन के बगल
का घर खरीदा
माँ से जूठन
धोने का कम छुड़वाया
बहन का घर
बसाने के बाद
अपना घर बसाया
पर वह अकेली
अब भी जाती रहती है
मालकिन के घर
मालकिन के
बच्चों की चाची , नानी कहलाती है
जैसे उसके दिन
बहुरे
मंगलकामना
करती मैं आज
हर अकेली के
दिन बहुरें |
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