1998
नियति का
क्रूर अट्टहास बना मन
रुक कर पूछे
प्रश्न स्वयं से
मेरा
क्या दोष ?
त्रास की इस
बेला में
जगता है अहसास
शायद सत्य का
दीपक उजाला नहीं करता
..................
जलने दो इस
दीप को
अन्यथा लील
जायेगा
असत्य का
अंधकार सत्य को अजगर सा
जुगनू सा
टिमटिमाता है मन
रात्रि के
अंधकार में कितना प्रफुल्ल हो जाता है मन
विचारों की
खनक जीवंत करेगी
हर घर को
घरों को
गर्माने दो |
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