मंगलवार, 10 सितंबर 2013

हर घर को गर्माने दो

1998

नियति का क्रूर अट्टहास बना मन
रुक कर पूछे प्रश्न स्वयं से
मेरा क्या दोष ?
त्रास की इस बेला में
जगता है अहसास
शायद सत्य का दीपक उजाला नहीं करता
..................
जलने दो इस दीप को
अन्यथा लील जायेगा
असत्य का अंधकार सत्य को अजगर सा
जुगनू सा टिमटिमाता है मन
रात्रि के अंधकार में कितना प्रफुल्ल हो जाता है मन
विचारों की खनक जीवंत करेगी
हर घर को
घरों को गर्माने दो |



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