1974
मेरी कृतग्य
रह तू
मैंने दिया
है मान तुझे
घर और औलाद
न तो रहती तू
सदा अवहेलित
निज पितृ गृह
में
इतनी समझदार
तो है तू
मेरे न रहने
पर
ढूंढेंगी तू
मुझे
और मेरे घर
को जीने के लिए सम्मान से
जो कि तुझे
कभी न मिलेगा
.........
चुभते शब्द
सलाखों की तरह
उसे दाग दिए |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें