बुधवार, 11 सितंबर 2013

चुभता सत्य

1974

मेरी कृतग्य रह तू
मैंने दिया है मान तुझे
घर और औलाद
न तो रहती तू सदा अवहेलित
निज पितृ गृह में
इतनी समझदार तो है तू
मेरे न रहने पर
ढूंढेंगी तू मुझे
और मेरे घर को जीने के लिए सम्मान से
जो कि तुझे कभी न मिलेगा
.........
चुभते शब्द सलाखों की तरह
उसे दाग दिए |

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