30 . 11 . 97
ओ रे मन !
खींच अपने
चारों ओर खींच परिधि
ऐसी सीमारेखा
बना
जिसमे
प्रवेशकर्ता हो जाय भस्म
बस तू विहार
कर
तेरी जीवनी
शक्ति ले जायेगी तुझे
तेरे
निर्धारित लक्ष्य तक एक दिन जरूर
हो न
किंकर्तव्यविमूढ़ तू आज
सत्य -असत्य ,
धर्म - अधर्म , पाप - पूण्य , अदि - अनादि
सब
तुझमें ही तो है
आनन्द ले
तू
जाड़े की
गुनगुनी धूप का
और गर्मी की
ठंडी रात का
कोहरे को
काटती सूर्य रश्मि भरेगी तुझमें ऊष्मा
और वर्षा का
इंद्र धनुषी रंग से पायेगा तू उमंग
भूल कर भी न
रुकना तू
बस चलते रहना
जहाँ भी कहीं
विश्राम करना
खींचना न
भूलना अपनी सीमारेखा
है दृढ
विश्वास पकड़ लेगा तू अपने लक्ष्य को
देखना एक दिन
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