बुधवार, 11 सितंबर 2013

जीत तो होगी ही

1994

कठिन है
बदलना व्यवस्था को
कभी कभी तो यूँ लगता है
बदलनेवाला ही बदल जायेगा
हर नाकाम चाल शोषण कर लेती है
एक टुकड़ा  आत्मविश्वास 
छुप जाता है अस्तित्व अपने ही खोल में
रात की थपकी 
पहुंचा देती है हमें स्वप्न लोक में
जहाँ जीतता है कछुआ ही |

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