1994
कठिन है
बदलना
व्यवस्था को
कभी कभी तो
यूँ लगता है
बदलनेवाला ही बदल जायेगा
हर नाकाम चाल
शोषण कर लेती है
एक टुकड़ा आत्मविश्वास
छुप जाता है
अस्तित्व अपने ही खोल में
रात की
थपकी
पहुंचा देती
है हमें स्वप्न लोक में
जहाँ जीतता है
कछुआ ही |
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