रविवार, 8 सितंबर 2013

नारी

2000

नारी !
तुम प्रकृति हो
स्नेह हो
श्रद्धा हो
प्रतिहिंसा की चिंगारी बुझा दो
आज तुम वात्सल्य रस में
नारी !
तुम सखा हो
प्रेमिका हो
श्रृष्टि हो
आश्रयदात्री हो
कांति हो
छटा हो
नहला दो धरा को तुम
आज अपनी चांदनी में
हम धरा पुत्र तुम्हारी पीड़ा हरेंगे
इतिहास रचेंगे
तुम सदा रहस्यमयी रोमांचकारी लावण्यमयी तिलिस्मी बनी रहो सदा
यही हम चाहें
और हम खोजते रहें तुममें अपना प्रतिविम्ब
यही तो जीवन है
तुम सदा नदी सी निर्मल कल कल बहती रहना
तालाब सी स्थिर कभी न होना |






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