पकड़ा है
मैंने
मान अपमान
भूल कुछ निज खुशियों के पल
गट्ठर में
बांध रखा है इन्हें
जीवल के
घटाटोप अंधकार में
पता
नहीं कैसे ये पल स्वयं निकल जाते हैं
और जगमगाने
लगते हैं
आकाश में
सितारों सरीखे
बातें करने
लगते हैं मुझसे
रोशन कर जाते
हैं
मेरा
अँधेरा मन |
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