09.07.2000
अंतर्मन के
लम्बे शीत युद्ध की परिणति
पागलपन हो या
नपुंसकता
दोनों ही
डुबोती है स्व को
और रचना करती
है एक अनोखे समाज की
नवोदित
क्षत्रिय प्रसन्न होते हैं रक्त बहा
गौरव पाते
हैं
अभिमन्यु बन
जाते हैं
पर रात्रि के
सन्नाटे में अर्जुन का मौन रुदन
हमें
नहीं भूलना चाहिए |
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