31.12.01
प्लेटफार्म
में टिका अस्तित्व
कभी मजबूरी
में
कभी हैरत से
देखता है रिश्तों को
उनके चेहरे
पर आते जाते भावों को
पैसे की
महिमा को
कभी
कोसता है मन दैव को
जिसने उसकी
नियति प्लेटफार्म पर बसने की बनाई
तो कभी
धन्यवाद देता है मन
उस
सर्वशक्तिमान को
जिसने जगंह तो
दी बसने की
इस प्लेटफार्म
पर बसने की
दैव तेरी जय |
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