- इंदु बाला सिंह
भूख पलती है कुत्ते की तरह
न जाने कहां
पर गले की रस्सी खुलते ही जोंक सी चूसने लगती है आदमी को ........
मैंने देखा एक दयालु को भोजन परसते भूखों को
पर
भूख निगल रही थी एक एक कर सबको...........
पल भर को बिलबिला गया मन मेरा
फिर
मेरा अंतर्मन खुश हुआ
मुक्ति मिल रही थी अभावग्रस्तों को ........
समस्यायें घट रहीं थी ।
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