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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016
शुभेच्छु मित्र
-इंदु बाला सिंह
समस्याओं से परे
जब
हम मिलते हैं हमारा रिश्ता कोई भी नामधारी क्यों न हो
तब
हम बिना किसी चाहत के
मात्र एक दुसरे के शुभेच्छु मित्र रहते हैं
आखिर कोई कितना रोना रोये
जिसने हंस कर जीना सीख लिया
उसने जीवन जी लिया ।
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