गुरुवार, 21 जनवरी 2016

कल की कल देखेंगे




-इंदु बाला सिंह


मेरी राह में
तुम सब मिलकर कंटीली झाड़ियों का अम्बार लगाते चले गये
और
मैं एक एक झाड़ी हाथों से हटाती
अपने हथेली की चुभन सहती
एक एक कदम आगे बढ़ती रही
पर भय  था मुझे
कहीं मेरी हथेलियों में सेप्टिक न हो जाय .......
पर
आनेवाले कल का समाधान मेरे पास न था  । 

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