गया काल
राजाओं का
अब न कोई
अभिशप्त
लौटने को
राह आगे जाती
है
परम्पराएं
परिमार्जित
होती हैं
नींव
नहीं हूं
घर की मैं.......
मैं तो
घर के प्रवेश
द्वार का
दरवाजा हू
तोडना न मुझे
वर्ना
घर
में घुस आयेगी काली आंधी |
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