सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

ओ रे ! मानव


घर में माँ को पूछते नहीं
मंदिर में पूजते हैं
सच में सजीव है माँ मंदिर में
तो कभी न करेगी
पूरी अभिलाषा तेरी रे !
रे !
सुन मानव !
प्रथम पूजा घर से होती शुरू
घर की पूजा
कोई देखे ये सोंच
देखनेवाला
देख ही लेता है
माँ की चाहत भूल
चला तू मंदिर में
कर्मकांड करने
ये कैसी नासमझी ?

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