वह सड़क के
किनारे
बैठी रो रही
थी
रात्रि के
सन्नाटे में
उसका रुदन
तड़पा दे रहा था
बेटी
को सम्बोधित कर रो रही थी
पगली थी वो
पर
किसी की माँ ,बहन भले न हो
बेटी तो थी ही
बगल से कारें
गुजर रहीं थीं
किसी घर का
एक भी
खिड़की दरवाजा
न खुला
एक आदमी आया
अरे ! ये पगली है !........
आये दिन एक पगली घूमती है
सड़क पर
कुछ महीनों बाद
उफ्फ
क्या जीवन है !
इसी लिये तो
युवा विदेश चले जाते हैं
गंदगी तो हर घर के सामने है
आदमी
भी कीड़ा है किलबिलाता हुआ
सड़क का
कुछ तो फर्क
हो
आदमी और
कुत्ते में
पैदा क्यों
करते
जब पालने का
दम न हो
कहाँ
गए रिश्ते ,मानवता !
मनुष्य तो एक
सामाजिक प्राणी है
ये कैसी
व्यवस्था है
हम किधर जा रहे हैं ?.......
अरे ! ये तो
किसी से हवा में बात करने लगी
ये लो अब ये चल दी
चलो ....शांति मिली माहौल को |
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