शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

माहौल


वह सड़क के किनारे
बैठी रो रही थी
रात्रि के सन्नाटे में
उसका रुदन तड़पा दे रहा था
बेटी को सम्बोधित कर रो रही थी
पगली थी वो
पर किसी की माँ ,बहन भले हो
बेटी तो थी ही
बगल से कारें गुजर रहीं थीं
किसी घर का एक भी
खिड़की दरवाजा न खुला
एक आदमी आया
अरे ! ये पगली है !........
आये दिन एक पगली घूमती है
सड़क पर
कुछ महीनों बाद
उफ्फ क्या जीवन है !
इसी लिये तो
युवा विदेश चले जाते हैं
गंदगी तो हर घर के सामने है
आदमी भी कीड़ा है किलबिलाता  हुआ
सड़क का
कुछ तो फर्क हो
आदमी और कुत्ते में
पैदा क्यों करते
जब पालने का दम न हो
कहाँ गए रिश्ते ,मानवता !
मनुष्य तो एक सामाजिक प्राणी है
ये कैसी व्यवस्था है
हम किधर जा रहे हैं ?.......
अरे ! ये तो किसी से हवा में बात करने लगी
ये लो अब ये चल दी
चलो ....शांति मिली माहौल को |

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