गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

छोटी कवितायें - 14

        ठूंठ



आशा की कोंपलें
ठूंठ पर
जब जब निकलीं
तब तब कोई उसे तोड़ ले गया
वह
बड़ी हसरत से
दूर दूर के फलते फूलते वृक्षों को देखता था |

आज ठूंठ दुखी है
कल लोग उसके पास खड़े थे
बात कर रहे थे
....आजकल लकड़ी बड़ी मंहगी है
.....इस ठूंठ को ही काट लेंगे हम
......यह तो बेकार है | 


      लड़की  

लड़की !
होश सम्हालते ही
माँ बन जाती है
भाई की माँ
पिता की माँ
फिर निज औलाद की माँ
मातृत्व के बिना कुछ भी तो नहीं वो !
ये कैसी मांग है हमारी ?

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