ठूंठ
आशा की कोंपलें
ठूंठ पर
जब जब निकलीं
तब
तब कोई उसे तोड़ ले गया
वह
बड़ी हसरत से
दूर
दूर के फलते फूलते वृक्षों को देखता था |
आज ठूंठ दुखी
है
कल लोग उसके
पास खड़े थे
बात कर रहे
थे
....आजकल लकड़ी बड़ी मंहगी है
.....इस ठूंठ को ही काट लेंगे हम
......यह तो बेकार है |
लड़की
लड़की
!
होश सम्हालते
ही
माँ बन जाती
है
भाई की माँ
पिता की माँ
फिर निज औलाद
की माँ
मातृत्व
के बिना कुछ भी तो नहीं वो !
ये
कैसी मांग है हमारी ?
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