रविवार, 22 सितंबर 2024

मकान के छूटने पर



 


#इन्दु_बाला_सिंह


मकान में 


वह आख़िरी रात थी हमारी


हमारे घर की 


और 


हम अपने अपने दुःख को छिपाते हुये 


एक दूसरे की ओर पीठ कर के


टूटना नहीं है 


इस भाव के साथ ज़मीन पर सोये रहे 


मन कह रहा था 


यह आख़िरी रात है 


घर की 


नींद खुली तो 


नया दिन था 


नया सूरज था 


नया निर्णय था 


हम अपने अपने रास्ते की ओर  बढ़ चले ……


हम 


मिलते रहे 


बिछड़ते रहे 


बहुत कुछ छूट गया .……


मेरा पूर्वाभास सच हुआ 


समय जीवित रहने के लिये बदलाव  माँगता है 


और 


हम बदलते रहे 


जीवित रहे ।



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