29 March
2015
17:03
-इंदु बाला सिंह
आदर्शों के
लबादे तले
मौन
चले .....
जीते
चले .......
एक स्वप्निल
सुख की चाह लिये
मन न माना
कभी
कि
सुख
तो मुक्ति में ही है ........
कोल्हू के
बैल सरीखा मन
आजीवन
तेल
पेरता रहा ...........
और
अपने राह के
कांटों की चुभन को
अपनी
सहिष्णुता का
प्रश्नपत्र समझता रहा .........
कदम ताल करते
हुये
प्रतिदिन अपने
सजीव होने का प्रमाण- पत्र
यह अबोध मन
लोगों को देता
रहा...........
स्वान्तः
सुखाय
अपना ही ध्वज
लहराता रहा |
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