शुक्रवार, 13 मार्च 2015

निस्पृह बैरागी


13 March 2015
15:52

-इंदु बाला सिंह


एक एक कर के
गुजरते
साथियों को देख
लगता है ........
बस
अब हमारी भी बारी आनेवाली है
और
मन
धीरे धीरे
निस्पृह बैरागी बनता जाता है |

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