23 March
2015
06:37
-इंदु बाला
सिंह
थोड़ा पीता है
तो क्या हुआ
नयी साड़ी भी
तो वही ला के देता है
बीस
वर्षीय बेटी के सामने दबे कड़े शब्दों में वह डांटता है अपनी औरत को .......
मरद से जबान
नहीं लड़ाएगी .....
औरत है
औरत जात की
तरह रह |
और
सुरक्षा भी तो
वही देता है
अपने परिवार
के प्राणियों को
औरत चार पैसा
कमा लेती है तो क्या हुआ
अपने मरद से
उसकी क्या बराबरी
रोज
सात बजे तक
अपनी संतानों के संग सोती
सास , ससुर ,
ननद को कोसनेवाली
भोर भोर अपने
मरद की डांट खानेवाली औरत
नवरात्रि के
नौ दिन
भोर भोर चार
बजे उठ
पूरे घर में
हलचल मचा देती है
पेटीकोट
ब्लाउज में झाड़ू बर्तन कर
नहा धो
माँ के सामने
जलती ज्योत के दीये में तेल डाल
अपनी जींस टी
शर्ट पहनी बिटिया के संग
खिड़की में
पर्दा लगा
दरवाजा बंद कर
बैठ जाती है
और
गीत गूँज उठता
है माहौल में ........
रूठ गयी माँ
मनाऊं कैसे ?.........
मनाऊं कैसे
?..........
लड़की कभी
अकेली नहीं रहती है
हमेशा
हर वर्ष चैत के महीने
में उसकी जन्मदात्री आती है
उसे शक्तिशाली
बना
अपने घर लौट
जाती है |
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