रविवार, 15 मार्च 2015

लड़की छांव बन जाती है |


16 March 2015
06:07


-इंदु बाला सिंह


अपनी सुरक्षा और समृद्धि के लिये
ब्याहता अपने जीवन साथी और पुजारी के साथ ही साथ
कितने ही रिश्तों के चरण स्पर्श करती है
खो कर
अपनी जड़ें
अपना वजूद
अपनी आकांक्षायें |
किस्मत की बेटी सरीखी
वह
रौंद भी दी जाती है सबसे पहले
घर परिवार की अभावग्रस्त स्थिति में
दुश्मन के हाथों |
लड़की ब्याहता बन
चरण स्पर्श करते करते
न जाने कब
अनजाने में ही
धूप में चल पाने की क्षमता खो
छांव की पर्याय बन जाती है |

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