मंगलवार, 31 मार्च 2015

मेरा शहर सजा


31 March 2015
13:11


-इंदु बाला सिंह


अहा !
हमारा शहर सजा
सड़कें सुधरीं
वीडियो कैमरे लगे
रंगीला बना शहर मेरा
साफ़ सुथरा हुआ शहर मेरा
सुना है
कोई आनेवाला है
मेरे शहर ......
जन्म दिवस मनेगा  कल
मेरे शहर का
रंग जमेगा
मस्त होंगे हम बच्चे
छुट्टी रहेगी
हमारे स्कूल की ......
जय हो मेरे शहर की |

सोमवार, 30 मार्च 2015

दूर न जाना


31 March 2015
08:17


-इंदु बाला सिंह


भूल कर भी न जाना
इतनी दूर
अपनों से तू
कि
टूट जाये स्नेह के धागे से बुनी हुयी
विश्वास की डोरी
ओ युवा !
क्योंकि इस जग में
जन्मदाता से बड़ा
कोई मित्र नहीं
हितैषी नहीं |

बेटी ने आखिर रुला दिया


March 31, 2013 at 12:03pm ·

-इंदु बाला सिंह

वह गरीब
पति के मौत पर न रोई
पिता के मौत पर भी न रोई
पर
बेटी के किसी के साथ भाग जाने पर
दहाड़ मार मार कर रोई ..........
रोना भी तो स्वास्थ्यवर्धक है |

मन मुस्काया - 1


31 March 2015
06:22

-इंदु बाला सिंह

सफेद मूछ और सफेद बाल वाले सज्जन से
मिली आज जो निगाह
तो
मुंह फेर लिये वे
मैं चौंकी
और उतना ही चौंकी
जितना चौंका करती थी
उस समय
जब पिता के यही सज्जन मित्र
मेरे पिता की तेरही तक
मुझे
सिर झुका कर नमस्कार करते थे
मन मुस्काया .........
न जाने क्यों |

अपना ध्वजा लहराता रहा


29 March 2015
17:03

-इंदु बाला सिंह 

आदर्शों के लबादे तले
मौन चले .....
जीते चले .......

एक स्वप्निल सुख की चाह लिये
मन न माना कभी
कि
सुख तो मुक्ति में ही है ........

कोल्हू के बैल सरीखा मन 
आजीवन
तेल पेरता रहा  ...........

और
अपने राह के कांटों की चुभन को
अपनी
सहिष्णुता का प्रश्नपत्र समझता रहा .........

कदम ताल करते हुये 
प्रतिदिन अपने सजीव होने का प्रमाण- पत्र
यह अबोध मन
लोगों को देता रहा...........
स्वान्तः सुखाय
अपना ही ध्वज लहराता रहा |



आकाश ताकते रहे


30 March 2015
11:09


-इंदु बाला सिंह


पुस्तकें

पढ़ पढ़ हुये

हम तो अकेले ........

पढ़ते गये

पल कटते रहे

पर

प्यास मिटी नहीं ...............

और

हम आजीवन

पुस्तकों के संग सोते जागते

न जाने क्या तलाशते रहे ...........

आकाश ताकते रहे


प्यासे के प्यासे रहे |

रविवार, 29 मार्च 2015

आ खड़ा होता होगा वह चेहरा



 29 March 2015
14:08

-इंदु बाला सिंह

अपने नाम का पत्थर लगा दिया तुमने
भूल कर .......
मिटा कर ...........
अपने सहोदर को
पर
जरूर कभी न कभी
आ खड़ा होता होगा वह चेहरा
तुम्हारे सामने .......
अपना अपराध
तो
सर चढ़ कर बोलता है
जीवन के
रेगिस्तान में |

शुक्रवार, 27 मार्च 2015

अतृप्त बच्चियों का भाग्य


28 March 2015
11:31

-इंदु बाला सिंह


बड़े घर के बच्चों के उतरन पहन
सड़क पर घूमते जत्थों के चमकते चेहरे
और
बड़े घरों से आता बुलावा
जहां तृप्त करता है
बच्चियों को
नवमी में 
वहीं
सहृदय बुद्धिजीवी को
दर्शाता है
यह दृश्य ........
कामवाली की अतृप्त बच्चियों का भाग्य |

मंगलवार, 24 मार्च 2015

अकेले रहते हैं |


24 March 2015
23:31
-इंदु बाला सिंह


कुछ मन बड़े कमीने होते हैं
अपनी ही बुद्धि की बात नहीं सुनते  हैं
बस
नैतिकता के पानी पर लिखते  रहते हैं
ठोकर खाते रहते हैं
गिरते उठते .....बस बढ़ते ही रहते हैं
ये अजूबे से ......अकेले ही रहते हैं
अपने पड़ोसी के सिरदर्द बने रहते हैं |

भटकता भोर भोर


25 March 2015
06:47
-इंदु बाला सिंह

माँ कहे मैंने जन्म दिया है
बहन कहे मेरा सहारा है
जीवन साथी कहे मैंने तेरे लिये जग छोड़ा है
मन से अकेला
बेचारा
बोझ का मारा
भटकता सड़क पर प्रतिदिन भोर भोर
मित्र की तलाश में
सेहत बनाने के बहाने |

सोमवार, 23 मार्च 2015

हारना मना है |



23 March 2015
22:10

-इंदु बाला सिंह



इन्कलाब की बातें करता

जीता मन

जब समझौते करते करते थक जाता है

तब

उसकी पीठ थपथपाती है बुद्धि  .........

जीना भी एक तपस्या है

घबराना नहीं

हारना मना है |

रविवार, 22 मार्च 2015

तेरा पिता तुझे ढूंढें


23 March 2015
07:26

-इंदु बाला सिंह

क्रांति !
तुझे देखा था मैंने अपने पड़ोस में
पर
आजकल तू दिखती नहीं
कहां रहती है तू
बड़े फेर में हूं
तेरा पिता 
आज
तुझे  तेरा हक देने को व्याकुल है
वह तुझे ढूंढ  रहा है |

चैत के महीने में उसकी जन्मदात्री आती है |


23 March 2015
06:37
-इंदु बाला सिंह


थोड़ा पीता है तो क्या हुआ
नयी साड़ी भी तो वही ला के देता है
बीस वर्षीय बेटी के सामने दबे कड़े शब्दों में वह डांटता है अपनी औरत को .......
मरद से जबान नहीं लड़ाएगी .....
औरत है
औरत जात की तरह रह |
और
सुरक्षा भी तो वही देता है
अपने परिवार के प्राणियों को
औरत चार पैसा कमा लेती है तो क्या हुआ
अपने मरद से उसकी क्या बराबरी
रोज
सात बजे तक अपनी संतानों  के संग सोती
सास , ससुर , ननद को कोसनेवाली
भोर भोर अपने मरद की डांट खानेवाली औरत
नवरात्रि के नौ दिन
भोर भोर चार बजे उठ
पूरे घर में हलचल मचा देती है
पेटीकोट ब्लाउज में झाड़ू बर्तन कर
नहा धो
माँ के सामने जलती ज्योत के दीये में तेल डाल
अपनी जींस टी शर्ट पहनी बिटिया के संग
खिड़की में पर्दा लगा
दरवाजा बंद कर बैठ जाती है
और
गीत गूँज उठता है माहौल में ........
रूठ गयी माँ
मनाऊं  कैसे ?.........
मनाऊं कैसे ?..........
लड़की कभी अकेली नहीं रहती है
हमेशा
हर वर्ष चैत के महीने में उसकी जन्मदात्री आती है
उसे शक्तिशाली बना
अपने घर लौट जाती है |





शुक्रवार, 20 मार्च 2015

तू नहीं तो मैं नहीं


20 March 2015
13:32


-इंदु बाला सिंह


ओ बेटे !

मेरी  आंख के तारे

तू नहीं

तो

मैं नहीं

मैं तेरी माँ हूं

तेरी धडकन हूं

क्या करूंगी जी कर मैं

जब

तेरी

किसीने  न सूनी

तो

मेरी क्या सुनेगा कोई |





गुरुवार, 19 मार्च 2015

तू ही कर्मयोगी है |


20 March 2015
11:51


-इंदु बाला सिंह


हार न मानना

तृप्त होंगे अपने

पुकारना न मित्र को

तेरी सुनेगा न कोई

तेरी नसों में भूचाल है

तेरे पांव में ताल है

तू ही शिव है

तू ही सुंदर है


तू ही कर्मयोगी है |

हम हैं न


20 March 2015
09:58

-इंदु बाला सिंह


जब जब

कोई इमानदार मिटता है ........

तब तब

आखों में

स्कूल के खिलखिलाते बच्चे आशा बंधाते हैं ........


हम हैं न |

सम्वेदना की पहचान


20 March 2015
07:15


-इंदु बाला सिंह


वह देखो ........

वह


अरे ! सामने देखो

नहीं दिखा !

क्या यार !

लड़खड़ा रहा है वह

अरे देखो !

गिर गया है वह

तुम्हें दिखायी नहीं देता !

गजब हो यार !

अब देखो उठ गया है वह

फिर चल रहा है वह

अरे ! देखो सड़क पर खून की धारी दिख रही है

अपने सहयात्री के अनर्गल प्रलाप से परेशान हो उठा मित्र

दुसरे दिन से

मित्र ने


नया सहयात्री ढूंढ लिया

और

नयी सड़क पकड़ ली |



बुधवार, 18 मार्च 2015

कठिन समस्या


18 March 2015
16:31



-इंदु बाला सिंह





जिस भाई ने



भिखारिन बना दिया बहन को


उसे


क्या नाम दे वह


कठिन समस्या उपजी है 


आज



उसके सामने |

गरीब शब्द


18 March 2015
21:25



-इंदु बाला सिंह



गर

आहों में असर होता

तो

गरीब शब्द मिट गया होता


डिक्शनरी से |

भूलना चाहती हूं मैं


18 March 2015
12:51
-इंदु बाला सिंह


क्यों दिखाया तुमने कथित अपनों को
वह घर
वह शान
आज की उनकी पहचान
अपनों की वह शौकत
जिसकी नींव पड़ी थी मेरे अपने के श्रम से ........
ओ फेसबुक !............
धन हजम
जन हजम
इंश्योरेंश गुम ......
मैं तो भली थी
अकेली ही चल रही थी
पर
अब भूलना चाहती हूं मैं
आज उन सभी को |

मंगलवार, 17 मार्च 2015

गड़ गयी मैं शर्म से |


18 March 2015
12:16

-इंदु बाला सिंह

सब बोलते हैं
बेटी पैदा हुयी है
और
गम्भीर से हो जाते हैं .....
क्या बिटिया पालना इतना भारी है ? .............
दस वर्ष की बिटिया के मुंह से यह सुन
गड़ गयी मैं शर्म से |

हम खुश हैं |


17 March 2015
15:49
-इंदु बाला सिंह

गरीबी का अर्थ है ........
पिता की आत्महत्या
माता की बीमारी से मौत
बेटी बेचना
पुत्र दान
आज जा के महसूसे हम ..........
अच्छा है
अखबार न आता था घर में
वर्ना
कैसे लिखते हम .....
' गरीबी वरदान है ' विषय पर
और
ढेर सारे नम्बर पाते हम
परीक्षा में |
कार , अच्छे कपड़े , जेवर का अभाव को गरीबी मान
लिखी गयी आदर्शवादी पंक्तियां
इतना सकून भरीं थीं
और
अपने दिल के
राजा थे हम .............
हम खुश हैं कि
हमसे हमारा बचपन न छिना |


सोमवार, 16 मार्च 2015

यह कैसी बुद्धिमानी है !


17 March 2015
09:30

-इंदु बाला सिंह


जब पटती नहीं
तो अलग राह क्यों चुन लें हम
गले पड़े रह
फंदा बन जाना
संबंधो की सलीब पर क्यों चढ़ें हम
एक दुसरे से छुटकारा पाने का नित नया तरीका ढूंढना
कैसा लोकलाज है !
यह कैसी बुद्धिमानी है !

नयी पौध की जिम्मेवारी


16 March 2015
23:00

-इंदु बाला सिंह


यूं लगता है कभी कभी
अपने बच्चे को इमानदारी का पाठ पढ़ाने में
माता पिता से भूल हो गयी ..............
शिक्षक भी सोंचता है
अपने छात्र को डांट डांट कर झूठ न बोलने की नसीहत दे कर
शायद वह कोई भूल कर बैठा ............
दिल बैठ सा जाता है किसी इमानदार सरल इंसान को हारते देख कर
कहीं तो दोषी हैं
उसके माता पिता या उसके शिक्षक...........
हम नयी पौध की जिम्मेवारी से
यूं ही मुकर नहीं सकते  |

जीत की पताका फहराना बाकी है |


23 November 2014
22:11
-इंदु बाला सिंह


कितने ही
मौसम आये
और
कितने ही चले गये
अब
घबराना कैसा
सांझ भई तो क्या हुआ
अभी सांस बाकी है
आस बाकी है
रात बाकी है
जीत की पताका फहराना बाकी है |

सिक्का तेरा इन्तजार है |


23 November 2014
07:51

-इंदु बाला सिंह


इंतजार है तेरा
सिक्के !
कब आयेगा तू हमारे शहर में
समय भी हुआ कंगाल
तुझ बिन |

भला हो जाता है सहोदर का |


25 November 2014
15:39


-इंदु बाला सिंह


समय ऐसा भी बदलता है यारो !
छोटा भाई भी
बन जाता है जेठ
सामने से गुजरना भी गुनाह हो जाता है
सहिष्णुता की परीक्षा होती रहती है
जितने कम हो जांय पैतृक सम्पत्ति के हकदार
उतना ही भला हो जाता है
हर सहोदर का |

रविवार, 15 मार्च 2015

लड़की छांव बन जाती है |


16 March 2015
06:07


-इंदु बाला सिंह


अपनी सुरक्षा और समृद्धि के लिये
ब्याहता अपने जीवन साथी और पुजारी के साथ ही साथ
कितने ही रिश्तों के चरण स्पर्श करती है
खो कर
अपनी जड़ें
अपना वजूद
अपनी आकांक्षायें |
किस्मत की बेटी सरीखी
वह
रौंद भी दी जाती है सबसे पहले
घर परिवार की अभावग्रस्त स्थिति में
दुश्मन के हाथों |
लड़की ब्याहता बन
चरण स्पर्श करते करते
न जाने कब
अनजाने में ही
धूप में चल पाने की क्षमता खो
छांव की पर्याय बन जाती है |

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

निस्पृह बैरागी


13 March 2015
15:52

-इंदु बाला सिंह


एक एक कर के
गुजरते
साथियों को देख
लगता है ........
बस
अब हमारी भी बारी आनेवाली है
और
मन
धीरे धीरे
निस्पृह बैरागी बनता जाता है |

नसीब


12 March 2015
23:16


-इंदु बाला सिंह

अथक प्रयत्न व चेष्टा के बाद भी
जब हम हारते हैं
तब
हम अपनी हार को 
नसीब का नाम दे कर
हम
समझौता कर लेते हैं
अपने समय से ............
और
मौन हो जाते हैं |

पुकारता है हर कोई


13 March 2015
12:56

-इंदु बाला सिंह

थका मन
सकून पाता है
पुकार कर
अपने स्वजन को
या
उस अनजानी शक्ति को 
अपनी समस्या के समाधान के लिये ......
और
निश्चिन्त हो जाता है
क्यों कि
वह
अपनी इमानदारी पर विश्वास रखता है
उसे लगता है
वह जीतेगा अवश्य |
यह अलग बात है .....
जो
थक गया
वह
मिट गया |

मंगलवार, 10 मार्च 2015

मैं निश्चिंत हूं |


11 March 2015
08:11

-इंदु बाला सिंह

लडकियां और मवेशी
बाड़े में ही भाते
सुरक्षित रहते
इसीलिये
मैंने
घर में
अपनी बेटी के लिये
भर रखा है अनाज के बोरे
खुदवा रक्खा है कूआं पानी के लिये
अब
मैं निश्चिन्त हूं |

तितली


08 March 2015
08:13

-इंदु बाला सिंह

कितनी ही अवस्थाओं से गुजर के बेटी बनती है तितली
और माँ बन आकश में उड़ती है वह
पर कुछ लालची शौकीन
ककून अवस्था में ही उसे डुबो देते हैं गर्म जल में
रेशमी कपड़े के लालच में …………...
देखते ही देखते भर लेते हैं वे बैंक
उसके इंश्योरेंस के पैसे से |