- इंदु बाला सिंह
प्रेम , कर्तव्य , भय के रेशमी धागों से लिपटी मैं ..... सोयी थी
बन गई थी
ककून .. . ....
एक दिन स्वयं कट गये .. धागे
आँखें चुंधियां गयीं .....
गुनगुनी धूप गर्माहट पैदा कर रही थी
असंख्य तितलियां उड़ रहीं थीं
और ... मेरे मन में उमंग ने अंगड़ाई ली .......
आकाश छूने की चाह जगी |
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