शनिवार, 6 अप्रैल 2013

छोटी कविताएँ - 21


बुत

जीना चाहते थे
पर तुम पूजने लगे हमें
आज बुत बन गये हम |









क्या छूटा ?

क्या क्या छूटा
सोंचने की फुर्सत ही नहीं
पर कुछ छूटा तो जरूर है
वरना इस भीड़ में अकेले क्यों रहते हम
आदर्शों की पोटली थामे
अजूबे क्यों रहते हम |

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