माँ एक सामान
बन गयी थी
पिता की
मृत्यु के बाद
माँ का
सिक्का थोड़े न होता है
कि वो चलेगा
माँ तो
पूजनीय है
मूर्ति है
वैसे घर की
मूर्ति को भी कौन पूजता है
मन्दिर में
पूजा करने से
लोगों
को दिखता है
अहा ! कितना श्रद्धालु है
नाम होता है
घर में कौन आ
कर देखता है
अरे
भई ! मेरा सामान है
चाहे जहां
रखें वृद्धाश्रम में या घर में
चाहे जैसे
रखें
आप अपना काम
देखिये
पिता के मकान , किरायेदार , नौकर - चाकर घर का राशन
पानी
भला अब कौन
देखेगा !
माँ को अपने
पास नहीं रखे हैं तो क्या हुआ
सड़क पर नहीं
फेंके हैं न
जिन्दगी भर
पति के अनुशासन में रहने वाली माँ
कानूनन पूरे
धन की मालकिन
देखते दखते
मित्र हीन
माटी का लौंदा
बन गयी |
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