शनिवार, 6 अप्रैल 2013

कल हों न हों हम


प्रतिदिन की तरह
भोर होते ही
उसने कस कर खींची नकेल
शब्दों की
पीछे बैठा अपनी औलाद उड़ी
वो घुड़सवार
अगर जीती
तो शाम को लौटेगी सकुशल
घर में
पीछे बैठी उसकी संतान
सीख रही है
अभी से जिन्दगी के दांव पेंच
उत्सुक कौतूहलपूर्ण बाल आँखों में
एक सुरक्षा व विश्वास की ज्योति टिमटिमाती रहती है
वक्त बदला
सम्बन्ध बदले
पर न बदला मातृत्व |

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