सपनों के चूर
चूर होते ही
आदमी यथार्थ
के धरातल पर आ खड़ा होता हैं
तलाशने लगता
है जीने के नये बहाने
कुछ ही पल
में
नैतिकता का
कुंडली मार बैठा उसके अंदर का सर्प
फनफना कर खड़ा
हो जाता है पूँछ के बल
उसके सिर पर
फन फैला कर
अद्भुत
रूप से छाया देने लगता है उसे |
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