गुरुवार, 12 नवंबर 2015

मौन मन




- इंदु बाला सिंह



कल
तुम बोलते थे
अपने निकम्मेपन को भूलते थे
तृप्त होते थे
मुझ पे लांछन लगा लगा के
आज
तुम चुप हो
मैं तो कल भी चुप थी
और
आज भी चुप हूं..........
औरत बोलती है
तो
इतिहास करवट लेता है.………
भूगोल की पढ़ायी  सदा  राह दिखाये
अंतरिक्ष उन्मुक्त करे मन
आज मौन मन चाहे डालना
 दाना
चिड़ियों को
और
हराना
चिड़ियों को नभ में ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें