मंगलवार, 24 नवंबर 2015

गमकाती हूं


24 November 2015
13:09


-इंदु बाला सिंह



डाल दी है राख मैंने
तेरे दुर्गुण पे ........अपने जी के सुलगते अंगारे पे
तू सामने नहीं
तो
क्यूं बांटू मैं
आज
जी में संचित कड़वे रस का चटखारापन.............
बीते समय के 
बाग़ से
मैं चुन लाती हूं
हर दिन
तेरे एक एक सद्गुण के फूल
और
उन से गमकाती हूं
मैं
अपना मुहल्ला ..........
मित्रों में
रोशनी बिखेरती हूं
अपनी
मुस्कुराहट की |

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