28 May
2014
11:32
-इंदु बाला
सिंह
सास के सुख
दुःख में
हंसने
रोनेवाली
बहू
जब तक
सास बनी
तब तक
युग
परिवर्तित हो चुका था
और
पुत्र द्वारा
नियुक्त
कामवालियां
सास के साथ
जीने लगी थीं
अपनी पगार
लेने लगी थीं ..................
सास ने
अपने ही घर
में
अपना वर्चस्व
और
बहू नाम की
मिठास को
खोने लगी थी
........
देखते ही
देखते
घर के बाहर और
भीतर
युवाओं का
युग आ गया था
........
ये कैसी समाज
चेतना थी
जो
मजबूती के नाम
पर
दिलों को
भावहीन कर रही
थी |
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