सोमवार, 9 जून 2014

नियति क्या चाहे तू


08 June 2014
21:24

नियति
वाह !
क्या खूब नचाये तू
हमें
खेत न लहलहाए हमारे
रोक के रखे तू
बादल सारे
हम
बीज बो कर बैठे हैं
ताकें
अब आसमान को ..........
तू
भी क्या रिश्वत चाहे ?

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