02 June
2014
14:16
-इंदु बाला
सिंह
सड़क के
किनारे
जमीन
छेक कर बनायी
गयी
दुकान की
गुमटियों के
पंक्ति की
एक बड़ी सी
टीन की गुमटी
और
उसमें
बिकनेवाली
पुरानी
कुछ
चमकती हुयी
तो
कुछ
पीली पड़ी
बच्चों के लिए
चित्रकथाएं
पत्रिकाएं
महिलाओं के
लिए
पत्रिकाएं
युवाओं के लिए
उपन्यास
छात्रों के
लिए
आठवीं से
बारहवीं तक की
सी० बी० एस० इ०
और
आई० सी०
एस० इ०
की किताबें
विभिन्न
प्रतियोगी परीक्षाओं की
किताबें
कंप्यूटर की
पत्रिकाएं
मैदे की लेई
से
चिपकाते
बाईंड करते
और
बेचते
उस पच्चीस
वर्षीय युवा को
एक नई
पुस्तकों की
बड़ी सी
दूकान का
मालिक बनने में
कालेज
में
पुस्तकों के
सप्लाई करने
और
पुस्तकों का
स्टाल लगाने का टेंडर लेने में
उसका अथक
उत्साह
और
परिचय रंग
लाया .........
मात्र दस वर्ष
में ही
देखते ही
देखते
वह
सड़क के किनारे
रद्दी से
किताबें खरीद कर बेचनेवाला
युवा
एक समृद्ध
पुस्तक विक्रेता बन गया
और
बेरोजगारों के
लिए
एक अनूठा
उदाहरन बन गया .......
आज भी
उस के दुकान का
एक रैक
छात्रों की
पुरानी पुस्तकों से भरा रहता है ......
आज भी
परीक्षा फल निकलने के बाद
एक चौथाई दाम में
छात्रों से
खरीदी गयी
ये
रीप्रिंट वाली पुस्तकें
वह
बड़े आराम से बेचता है
और
अपने
पुराने कौशल को याद रखता है |
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