घर की
तीसरे दर्जे
की नागरिक
पति की
अनुगामिनी
पुत्र के सुख
में
आजीवन अपना
सुख तलाशती
स्त्री
अनजाने में
दे ही जाती
है
अपने संस्कार
की वसीयत
अपनी पुत्री
को
और
वह नवयुग की
पुत्री
पढ़ लिख कर
आर्थिक रूप
से
आत्मनिर्भर रह कर भी
बनी रहती है
अपने घर में
तीसरे दर्जे नागरिक |
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