संस्कार की
दुहाई
है कितनी
प्यारी राजनीति
मोहक नशीली
भूख मिटानेवाली
पर
कल्पना सिहरा
देती है
महाभारत के
पश्चात्
अंगड़ाई ले उठी
उस
रक्तिम भोर की
चरों ओर
श्मशान सा सन्नाटा है
बुद्धिजीवी
खामोश सिर
झुकाए चले जा रहे हैं ........
धीरे धीरे
अंधकार गहरा रहा है |
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