वह शिक्षिका थी
कितने ही
पिताओं का वह सहारा थी
अपनी बेटियां
उसके घर
ट्यूशन के लिए
भेज
माता पिता
निश्चिन्त हो जाते थे
सभी अभिभावक
अपने घर की
समस्या का
दुखड़ा रोते थे उसके पास ......
घर में कोई
बीमार है
तो
कभी कोई त्यौहार है
इसीलिये फीस
देने में देरी होगी ....
मैडम ! .....
देखिये न
लडकियों को
सम्हालना मुश्किल होता है
कुछ दिन पहले
हमारे मैनेजर
ने अकेले में
मेरी बिटिया
का हाथ पकड़ लिया था
इस लिए हम उसे
हास्टल भेज दे रहे हैं ......
अरे मैडम !
मैंने
अपनी बड़ी
बिटिया का ब्याह तो
अट्ठारह लगते
ही कर दिया था हमने .....
बड़ी मुश्किल
होता है
जब देखो
बिटिया मोबाइल से बातें करते रहती है
अट्ठारह की
होने के बाद
वो कहीं भाग
जाय
तो हम कुछ
नहीं कर पाएंगे .....
गरीब हैं न हम
हमारी लड़की ही
हमारी इज्जत है ......
हर घर की
सहारा थी
वह पैंतीस
वर्षीया शिक्षिका
जिसे
अट्ठारह वर्ष
कभी लगा ही न था
क्यों कि
वह बिन बाप की
थी |
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें