अष्टमी के
दिन
एक पीली साड़ी
को मोड़
एक स्त्री
आकृति बना
सूर्योदय से
पूर्व
नमस्कार करती
थी
घर की
अर्धांगिनी
तब
पल भर को
इश्वर की कण कण में उपस्थिति
का भान होने
लगता था
पत्थर की मूरत
टूटे
पर
मन की मूरत
कैसे तोड़े
तू |
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