22 April
2014
17:36
- इंदु बाला सिंह
जाति धर्म से परे
इंसानियत की
धारणा लिए
वसुधैव
कुटुम्बकम के सपनों में जीता
पुस्तकीय मन
समाज में
अकेला पड़ता
उसका अस्तित्व
धीरे धीरे
धर्म व जाति
के सांचे में ढलने लगा
समय के आंवा
में पकने लगा
समाज में जीने
लगा
मित्रों से
घिरा रहने लगा
अब
उसका मन खुश
था
और
बुद्धि
मुस्कुरा रही थी |
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