रविवार, 27 अप्रैल 2014

मन्दिर का पुजारी


28 April 2014
07:24
. इंदु बाला सिंह

साईकिल भांजते हुए
वह
सुबह सुबह गुजरता था
हमारे
घर के सामने से
और
रात को आठ बजे भी .....
दोपहर में कब लौटता था
किसी हिन्दी प्रदेश  से आया
वह ब्राह्मण पुजारी
पता नहीं ......
एक बार
बहुत दिनों तक वह दिखा नहीं
सुनने में आया
कि
उसकी पत्नी को भगवान ने बुला लिया अपने पास
बहुत दिन बाद
वह लौटा
अपने पुत्र के साथ
अब
पुत्र जाता है
तिलक लगा धोती कुरते में पिता की तरह
मंदिर में पूजा करने
क्यों कि
मंदिर दूर है
और
पिता को उतनी दूर तक
साईकिल चलाने में परेशानी होती है .....
अब पिता आसपास के घरों में
पूजा करता है
ब्राह्मणों की यह अपना गाँव छोड़
सुदूर राज्यों में जा
मंदिरों को पेट भरने का साधन बनाना
हर समझदार  इंसान को
झकझोर देता है .......
ये कैसा जीवन है 
जिसे
वह ब्राह्मण पीढी दर पीढ़ी झेल रहा
और
मुस्कुरा के
हमारे पाप काट रहा
हमारी शादी व्याह करा के
जी रहा |




झांसी की खामोशी


28 April 2014
06:37

        .इंदु बाला सिंह 

पीठ पर पुत्र बांध
वह जब कूदी
तलवार ले
जीवन संग्राम में
घरों की खिडकियों के
बड़े पर्दे खिंच गये
पर
स्वर्ग से
जौहर की हुयी आत्माओं ने
फूल बरसाए
आज झांसी का मान
युद्धरत था
झांसी खामोश थी |



शनिवार, 26 अप्रैल 2014

कर्ज में डूबा


27 April 2014
08:39

              -इंदु बाला सिंह 


बिजिनेस डूबा
कर्ज चढ़ा .......
घर बिका देखते देखते
पर
उस व्यक्ति के मनोबल ने
अचंभित किया मुझे .......
क्योंकि
वह
अपने ही मुहल्ले में
एक गली छोड़ किराये पर
मकान ले रहने लगा
सपरिवार |
लोग तो हारने पर
कम से कम
मुहल्ला बदल लेते हैं ......
बच्चे के
कक्षा में फेल होने पर
तो
अभिभावक
उसका स्कूल ही बदल देते हैं ...
उसकी पत्नी
पहले की तरह
सुबह पार्क में टहलती है
और
बच्चे भी पार्क में खेलते हैं |

जीने की कला


26 April 2014
08:43
  -इंदु बाला सिंह

गिराना 
नजरों से 
बड़ा आसान है 
किसी के चरित्र पर उंगली उठाईये 
सफाई देते देते 
जिन्दगी निकल जायेगी आपकी 
क्यों कि 
तो 
आपके चारों ओर 
चाटुकारों का घेरा है
और 
ही आपकी चमड़ी मोटी है 
बस लिखते रहिये 
इस आस में 
कि 
कोई तो माई का लाल जन्मेगा 
जो 
इतिहास खंगालेगा 
वैसे 
लोग भूगोल में ज्यादा रूचि रखते हैं 
पर 
मरुभूमि में 
जल की आस लिए 
चलते रहना 
थक कर चाल धीरी करना 
और तेज करना 
मुनासिब है 
इंसान को 
जीने के लिए |




शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

जन्मदाता के सपने


26 April 2014
06:30
  -इंदु बाला सिंह


आंख के तारे
होते हैं अपने सपने
जीवन - संध्या के सहारे
जो
कभी न गायब होते
जन्मदाता की नींद से  ........
श्रद्धा सुमन न चाहें
वे ......
हम उनकी नियति देखें
जो
आजीवन तरसें
परदेसी सन्तति के साथ के लिए .....
सपने ही तो सदा के सहारे 
उनके
वे
स्वप्न में खेलते अपनी सन्तान से
दौड़ते
सन्तति को बचाते
उसके दुश्मन से ..........
सपने होते
कितने प्यारे
हर बुजुर्ग के सहारे
जो
उसका साथ
उसके चिर निद्रा की गोद में
जाने तक देते  |

कहाँ हैं बुजुर्ग !


25 April 2014
22:09
-इंदु बाला सिंह


एक कम्पनी के फेसबुक पेज
को बस यूं  हीं देखते हुए ख्याल उपजा
पूरा पेज माँ बेटी
पिता पुत्र
पति पत्नी ..बेटी  बेटी के मुस्कुराते चेहरे
से भरा पड़ा था
पर उस प्रचार के किसी पेज में
मुस्कुराता बुजुर्ग
या
दादी दादा नानी नाना न थे
फिर ख्याल आया
अरे !
वे तो ओल्ड होम में होंगे
हर घर के
ड्राइंग रूम में
तो
मुस्कराती पत्नी सजती है
रिश्ते तो गरीबी में पलते हैं
अमीरी में नहीं |


गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

डिग्री


25 April 2014
06:51
        - इंदु बाला सिंह


बिन बाप की बिटिया 
पोस्ट ग्रजुयेट बी० एड० थी
पर
सेवेन्थ पे कमीशन वाले प्राईवेट स्कूल लायक डिग्री नहीं थी
उसके पास
क्यों कि
उसकी माँ दहेज दे कर उसके के लिए
हाई प्रोफाइल वाला पति न खरीद पाई थी ..........
अतः
वह
एक छोटे से स्कूल में
कम तनख्वाह में जी रही थी
सपने देख  रही थी
कभी तो उसके दिन फिरेंगे ..............
उसे
एक हाई प्रोफाइल वाली डिग्री मिलेगी ..........
सरकारी नौकरी के पीछे भागना सुदूर बड़े शहर में
आसान न था
उसके लिए अकेली
क्यों कि
न तो उसके कोई सहयोगी रिश्तेदार थे
और
न ही
वह पुरुष मित्र बनाने की कला में पारंगत थी |



बुधवार, 23 अप्रैल 2014

चमकेगा अस्तित्व


23 April 2014
15:42
     - इंदु बाला सिंह

अपनों से मिले
प्रतिदिन का अपमान विष
कंठ में धारण किया सदा जिसने
क्या खा कर मारेगा जग उसे ........
वह तो चमकेगा जग में .....
देखना फहरेगी उसकी कीर्ति पताका
एक दिन .......
और
उस पल
मौन रहेंगे उसके स्वजन |

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

युवा अस्तित्व


22 April 2014
17:36
      - इंदु बाला सिंह

जाति धर्म से परे
इंसानियत की धारणा लिए
वसुधैव कुटुम्बकम के सपनों में जीता
पुस्तकीय मन
समाज में अकेला पड़ता
उसका अस्तित्व
धीरे धीरे
धर्म व जाति के सांचे में ढलने लगा
समय के आंवा में पकने लगा
समाज में जीने लगा
मित्रों से घिरा रहने लगा
अब
उसका मन खुश था
और
बुद्धि मुस्कुरा रही थी |



शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

पीना गलत है

   - इंदु बाला सिंह 


गर मैंने पी
तो
इतना हंगामा ....
भला क्यों ?
तू पीया तो
तो
लोगों ने अनदेखी कर दी .........
मैंने
समाज का ठेका तो
नहीं लिया .....
पीना
गलत बात
यह समझाने  का कान्ट्रेक्ट
तुम्हें किसने दिया |

जय हो तेरी






- इंदु बाला सिंह


मेरे रुदन पर 
बही तेरी कविता
श्रोता मिले तुझे
वाह वाह बोले ...
आह किये ...
मेरे दुःख पर
छापी कथा तूने
पाठक मिले तुझे
वे दीर्घ निःस्वास लिए
टाइम पास किये ..
पर मेरी आह से निकली जब चिंगारी
और
हाथ में उठी तलवार
तो
तू न फटका पास मेरे ...
मुंह फेर मौन हो
भूला तू मेरा अस्तित्व तू भूल चला
जय हो
लेखक तेरी 

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

विचार


कहीं कोई समझौता नहीं
विचार बदलते नहीं
पर
इंसान मिट जाते हैं
यूं लगे
कभी कभी
आखिर क्यों जन्माते हैं
हम |

शिक्षिका


वह शिक्षिका थी
कितने ही पिताओं का वह सहारा थी
अपनी बेटियां
उसके घर
ट्यूशन के लिए भेज
माता पिता निश्चिन्त हो जाते थे
सभी अभिभावक
अपने घर की
समस्या का दुखड़ा रोते थे उसके पास ......
घर में कोई बीमार है
तो
कभी कोई  त्यौहार है
इसीलिये फीस देने में देरी होगी ....
मैडम ! .....
देखिये न
लडकियों को सम्हालना मुश्किल होता है
कुछ दिन पहले
हमारे मैनेजर ने अकेले में
मेरी बिटिया का हाथ पकड़ लिया था 
इस लिए हम उसे हास्टल भेज दे रहे हैं ......
अरे मैडम !
मैंने
अपनी बड़ी बिटिया का ब्याह तो
अट्ठारह लगते ही कर दिया था हमने .....
बड़ी मुश्किल होता है
जब देखो बिटिया मोबाइल से बातें करते रहती है
अट्ठारह की होने के बाद
वो कहीं भाग जाय
तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे .....
गरीब हैं न हम
हमारी लड़की ही हमारी इज्जत है ......
हर घर की सहारा थी
वह पैंतीस वर्षीया शिक्षिका
जिसे
अट्ठारह वर्ष कभी लगा ही न था
क्यों कि
वह बिन बाप की थी |

सोमवार, 14 अप्रैल 2014

आत्मघात

बलात्कार
दबंगई नहीं
आत्मघात का आह्वान है |

अपने

अमीरी ने
अपने पराये बनाये
और
गरीबी ने
पराये अपने |

मकड़जाल

हंस कर कहा उसने
कभी तुलना न करना
माँ के
हाथ की रोटी का
उस खाने का स्थान लेने में
पत्नी को
एक पीढ़ी गुजर जायेगी
और
मुझे सोंचने के लिए
प्रेरित कर गया
वह युवा .......
आज का युवा
किसके लये तड़प रहा है
माँ के लिए
या
पत्नी के लिए |

रविवार, 13 अप्रैल 2014

पत्नी का प्रश्न



मैंने
तुम्हारे लिए
अपने माता पिता को त्यागा
जन्मदाता को भूल चली
उनके प्रति कृतघ्न हो गयी
पर
तुमने
मेरे लिए क्या त्यागा ?
यह एक ऐसा अनुत्तरित प्रश्न है .....
जिसका उत्तर
पत्नी
सदा मांगती रही है |

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

बेटी की किस्मत


बेटे की तरह
अधिकार
सुख सुविधा
पा कर
घर में
बड़ी होने वाली
पापा बेटे का सम्बोधन पाने वाली बेटी
जब
स्कूल ,कालेज से निकल कर
आफिस पहुंची
वैवाहिक बंधन में बंधी
तब
उसे मालूम हुआ
कि
वह भी
सर्वहारा समाज की
एक मामूली सी आम सदस्य है |

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

कितने समझौते


आदमी
औलाद है
समझौते  की
कितने समझौते करता है वह
जीने के लिए........
नमन
समझौता तुझे |

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

सर्वहारा न बनने देना


स्त्री
जिस दिन सर्वहारा बन जायेगी
उस दिन
उसकी आंखों से
प्यार की खुशबू नहीं
आग की चिंगारी छिटकेगी
बहुत छला तुमने
माँ कह कर
अब और नहीं
सदा उसे
किसी की बहन
या
पत्नी कहा
उसके अपने वजूद को
मानवी समझ
सहा नहीं
मान दिया नहीं तूने |

स्त्री के गहने


सादा जीवन ऊच्च विचार 
हैं जिस स्त्री के गहने 
सकी खूबसूरती के क्या कहने |

खोना न चाहूं तुम्हें


तुम्हारे
अनर्गल
गलत तर्क
के 
प्रत्युत्तर दे
मैंने
तुम्हें खोना न चाहा .........
और
इसी का फायदा उठा
तुम आजीवन बढ़ते रहे
जिस दिन तुम्हे अपनी गलती का
अहसास होगा
उस दिन
बहुत ही देर हो चुकी होगी .......
पर
मुझे तो
सदा ही खुशी रहेगी
कि
मैंने
आजीवन
तुम्हें खोया नहीं |

थप्पड़ का मजा



नटखट मुन्ना
अख़बार में पढ़ कर
सोंचा
कितना मजा
आता होगा न
मारने में
बड़े को थप्पड़ .......
तुरंत कार्यान्वित की 
उसने अपनी मंशा
और
बगल से गुजरती हुयी बहन
को दन से मारा
एक थप्पड़ कनपटी पर  ......
दीदी का हल्ला
और
पिटाई की धमाधम  आवाज
चीख चिल्लाहट सुन
पापा आये
आँख तरेरे
पल भर में
मुन्ने को बना दिए मुर्गा ड्राइंग रूम में
और
बैठ गये खुद अखबार पढ़ने |

रविवार, 6 अप्रैल 2014

महाभारत क्यों


संस्कार की दुहाई
है कितनी प्यारी राजनीति
मोहक नशीली भूख मिटानेवाली
पर 
कल्पना सिहरा देती है
महाभारत के पश्चात्
अंगड़ाई ले उठी
उस
रक्तिम भोर की
चरों ओर श्मशान सा सन्नाटा है 
बुद्धिजीवी
खामोश सिर झुकाए चले जा रहे हैं ........
धीरे धीरे अंधकार गहरा रहा है |

मित्रता


वो और मैं
मित्र हैं
और
उसके दुश्मन
मेरे पक्के मित्र हैं |

ईश्वरीय अहसास


अष्टमी के दिन
एक पीली साड़ी को मोड़
एक स्त्री आकृति बना
सूर्योदय से पूर्व
नमस्कार करती थी
घर की अर्धांगिनी
तब
पल भर को
इश्वर की कण कण में उपस्थिति
का भान होने लगता था
पत्थर की मूरत टूटे
पर
मन की मूरत
कैसे तोड़े
तू |

अष्टमी की पूजा


मुन्ना चहक उठा
आहा
आज रात
दालपूड़ी वाली पूजा है
कल मिलेगी सूर्योदय से पहले खीर पूड़ी ,
गुलगुले , आलूदम कितनी सारी चीजें खाने में
और
वह
जल्दी से
चादर तान सो गया
सुबह उसे जल्दी जल्दी उठना था |

पुत्र प्रेम


कहते हैं माँ
तो
माँ ही होती है
पर एक समय
ऐसा भी आ जाता है
जब
माँ
माँ नहीं मित्र बन जाती है
और
अपनी ही पुत्री से
इर्ष्या करने लगती है
उसके अर्जित धन की लुटेरी
बन
पुत्र के नाम
अपने धन जमीन की वसीयत लिख जाती है
सोंच में हूं
ऐसी माँ को किस नाम का
सम्बोधन दूं |


गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

अपरिचित मित्र


कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
जो 
राह चलते
किसी की मदद कर आगे निकल जाते हैं
पल भर को मिलने वाले
ऐसे अपरिचित मित्र
हमें आजीवन उदास पलों में
याद आते हैं ........
हमारे मन में
जीने की चाह जगा जाते हैं |

ठसक


शान की बात है
उनके  लिए
क्यों कि
उनके पास चार मकान हैं
पर
वे रहते हैं एक मकान में ही |
तीन मकान में                                                                    ताला लगा रहता है
और
उन खाली मकानों को
जितना घूरती हैं
लोगों की तरस भरी निगाहें
उतना ही बढ़ता जाता है
मेरा स्टेटस
क्योंकि मैं भी
मकान मालकिन हूं |




बुधवार, 2 अप्रैल 2014

तीसरे दर्जे की नागरिक


घर की
तीसरे दर्जे की नागरिक
पति की अनुगामिनी
पुत्र के सुख में
आजीवन अपना सुख तलाशती
स्त्री
अनजाने में
दे ही जाती है
अपने संस्कार की वसीयत
अपनी पुत्री को
और
वह नवयुग की पुत्री
पढ़ लिख कर
आर्थिक रूप से
आत्मनिर्भर रह कर भी
बनी रहती है
अपने घर में तीसरे दर्जे नागरिक |

रैली


मेसेज आया है जी !
हमारे मोबाइल में
परसों पार्टी की रैली है
देखो कितना याद रखते हैं हमें
हमारे नेता गण
लेकिन कैसे जाउंगी मैं
इतनी दूर
दुसरे जिले में
और
मुझे याद आ गयी 
वह ट्रेन यात्रा
जिसमें एक स्टेशन में
चढ़ गया था
युवक युवती व वृद्ध वृद्धा का जत्था
सब ढकेल रहे थे
एक दुसरे को
बूढ़ी महिलाओं को गोद में उठा कर
डिब्बे की ऊपर वाली
सामान की बर्थ पर बैठा दे रहे थे
जनरल डब्बा
ठसा ठस भर गया था
बगल के सहयात्री से पता चला
वे किसी रैली में भाग लेने जा रहे थे
बस एक घंटे बाद
उनका गन्तव्य आ गया
और वे उतर गये |



झांकोगी कब तक ?


झरोखे से !
झांकोगी
आखिर कब तक
और
इन्तजार करोगी
किसी राजकुमार का
जो
तुमको बाईज्जत सड़क पर ले जाये ........
खुद सड़क पर
अपना विशालकाय रूप दिखा
तू ..............
अंश है
तू भी
शक्ति पुंज का ......
तू
सजीव है ........
अपने ही मान का
पर्याय है तू
फिर
किस बात का है
भय तुझे |

पकड़ में न आऊं मैं


एक गाय पर
डाल फंदा
नायिलन  के मोटे तार से
चार पुरुष
खींच रहे थे
अद्भुत नजर था
कौतुहल भरे मेरे नेत्र देख रहे थे
नवरात्रि के त्यौहार में
गाय को पकड़ने का दृश्य .....
तभी
दिखी मुझे
थोड़ी दूरी में खडी एक मिनी ट्रक
जिसमे में दो गायें लदी  थीं
इधर
फंदे में फंसी गाय
उछली कूदी
पर निकल न पायी तार के फंदे से
चारों पुरुष
खींच कर लाये गाय को
ट्रक का पिछला हिस्सा खुला
प्लाई का पट्टा गिरा
अब
इस पर से
चढना था गाय को ट्रक में ......
पहले दो पुरुष चढ़े
ट्रक पर
खींच खींच हारे
गाय को उपर
पर
बैठ गयी
वह फंदे में फंसी गाय
प्लाई के पास ही ......
उपर से खींचा गया
गाय को रस्सी से
नीचे पूंछ उमेठी गयी गाय की
पर अड़ गयी
वह गाय
हिली न डुली अपने स्थान से
पल भर को लगा मुझे
अरे !
उफ्फ !
खींची जा रही थी गाय
और
उसकी मजबूरी की
मैं
दर्शक थी
दस मिनट चला यह दृश्य
कितनी कारें
गुजर गयीं बगल से
हार कर
छोड़ दिया
उन कांजीहाउस के कर्मचारियों ने
उस जिद्दी गाय को
और दो पकड़ी गयी गायों के साथ
स्टार्ट हुयी
वह कांजीहाउस की मिनी ट्रक
पर
उससे पहले
मेरे सामने से भागती हुयी गुजर गयी
वह बहादुर गाय
मैंने देखा उसे पास से
आश्चर्य से
उस
बहादुर जानवर को
उस
शक्ति के प्रतीक को
उफ्फ !
वह गाभिन थी |