- इंदु बाला सिंह
उसे
झूठ के बीज को रोपते देखा
झूठ के पौधे को फूलते भी देखा
पर
न जाने कैसे स्वतः झूठ के फूल झड़ गये ..…
आखिर कोई न कोई तो झूठ का फूल तो बच ही जायेगा एक दिन ..…
बड़ा मनमोहक लगता है झूठ का विषैला फूल
मंत्रमुग्ध हो जाता है मन
इस फूल के सम्मोहन में देखा है मैंने
मेहनतकश आदमी को फंसते……
आखिर पल भर को खुश होने का हक मेहनतकश को भी है
कल किसने देखा है
सत्य की आस लिये लोगों को जीते भी देखा है ...…
बड़ी अजब सी दास्तान है ... इस जिंदगी की
कभी पानी का बुलबुला बन जाती है
तो
कभी पहाड़ बन जाती है
कभी कभी जीवन सन्ध्या ...… सुकूनदायक भी बन जाती है ।
झूठ के पौधे को फूलते भी देखा
पर
न जाने कैसे स्वतः झूठ के फूल झड़ गये ..…
आखिर कोई न कोई तो झूठ का फूल तो बच ही जायेगा एक दिन ..…
बड़ा मनमोहक लगता है झूठ का विषैला फूल
मंत्रमुग्ध हो जाता है मन
इस फूल के सम्मोहन में देखा है मैंने
मेहनतकश आदमी को फंसते……
आखिर पल भर को खुश होने का हक मेहनतकश को भी है
कल किसने देखा है
सत्य की आस लिये लोगों को जीते भी देखा है ...…
बड़ी अजब सी दास्तान है ... इस जिंदगी की
कभी पानी का बुलबुला बन जाती है
तो
कभी पहाड़ बन जाती है
कभी कभी जीवन सन्ध्या ...… सुकूनदायक भी बन जाती है ।
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