बुधवार, 13 नवंबर 2013

आजाद हैं लडकियां

परिवर्तन आया
खोल दी हथकड़ी उसने
लडकियों की
शोषित नहीं अब वे
धर्म के नाम पे
सहानुभूति के नाम पे
अब वे देवी नहीं इंसान हैं
जी रही हैं वे अकेली
सन्तान नहीं चाहिए
कौन सम्हालेगा
पति नहीं चाहिए
मैं ही क्यों घर सम्हालूं
भाई नही चाहिए
मैंने सहारा दिया बचपन में उसे
पैतृक सम्पत्ति उसे दिए
परिवर्तन ने अकेली बना दिया
ब्याहता को भी
माँ को भी
पति और पुत्र रहते हुए भी
आज अकेली है वह
तीज त्यौहार नहीं
शादी ब्याह नहीं
हित मित्र नहीं
पेन फ्रेंड और फेसबुक फ्रेंड में सांसें लेती हैं लडकियां
जरूरतमंदों की भीड़ से घिरी
खो दी लड़की ने रंगीनियां जीवन की
ये कैसी आजादी मिली उसे
हमने आज ये कैसी वसीयत दी अपनी बेटियों को ?









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