परिवर्तन आया
खोल दी हथकड़ी
उसने
लडकियों की
शोषित नहीं अब
वे
धर्म के नाम
पे
सहानुभूति के
नाम पे
अब वे देवी
नहीं इंसान हैं
जी रही हैं वे
अकेली
सन्तान नहीं
चाहिए
कौन सम्हालेगा
पति नहीं
चाहिए
मैं ही क्यों
घर सम्हालूं
भाई नही चाहिए
मैंने सहारा
दिया बचपन में उसे
पैतृक
सम्पत्ति उसे दिए
परिवर्तन ने
अकेली बना दिया
ब्याहता को भी
माँ को भी
पति और पुत्र
रहते हुए भी
आज अकेली है
वह
तीज त्यौहार
नहीं
शादी ब्याह
नहीं
हित मित्र
नहीं
पेन फ्रेंड और
फेसबुक फ्रेंड में सांसें लेती हैं लडकियां
जरूरतमंदों की
भीड़ से घिरी
खो दी लड़की ने
रंगीनियां जीवन की
ये कैसी आजादी
मिली उसे
हमने आज ये
कैसी वसीयत दी अपनी बेटियों को ?
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