पिता की
मृत्यु के बाद
भाई
को ' सर ' सम्बोधन मिलने लगा
सुख दुःख के
कार्ड आने लगे
' सर ' के नाम
हर जगह ' सर '
सपरिवार जाने लगे
बुलावा भी तो
उन्ही के परिवार को था
बहन को लोग
भूल चले
अब वो लड़की थी
जो अपने पैतृक
घर के एक कमरे में रहती थी
वह खुद कमाती
थी
निर्भर न थी
आर्थिक रूप से भाई पर
हर पल उसे भय
था
किसी भी समय '
सर ' उससे घर खाली करवा सकते थे
सड़क पर उसे
मनचलों का भय था
वह फब्तियों
से भयभीत थी
बलात्कर से
भयभीत थी
लड़की थी न
कभी कभी
सोंचती थी वो
ब्याह कर ली
होती किसी के भाई से
या किसी के
पिता से
तो शायद वो भी
इज्जत पाती
सुरक्षित रहती
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