1971
मैं कौन हूँ
तुम
नहीं पहचानते मुझे !
तुम्हारा ही
तो प्रतिविम्ब हूँ मैं
आओ
झांको मेरी
आँखों में
पहचानो
मेरी परतें
उघाड़ो
नवीं रूप !
मेरी चीड -
फाड़ करो
मुझे समझो !
.......................
............................
नहीं पहचाने !
मैं प्रकृति
हूं
मैं कविता हूं
मैं नारी हूं
तुम अपने और
मेरे बीच के धुंध को
चीर नहीं सकते
क्या !
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