मंगलवार, 9 जून 2015

मन के रूप


10 June 2015
07:23

-इंदु बाला सिंह

पानी है मन
यह बनता है कभी सुनामी 
तो कभी विलुप्त नदी 
कभी कभी तो यह ओयसिस बन जाता है 
और कभी 
धीर स्थिर सागर सा बन 
यह 
मेरे तन को शीतल कर देता है |

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