10 June
2015
07:23
-इंदु बाला
सिंह
पानी है मन
यह बनता है कभी सुनामी
तो कभी विलुप्त नदी
कभी कभी तो यह ओयसिस बन जाता है
और कभी
धीर स्थिर सागर सा बन
यह
मेरे तन को शीतल कर देता है |
तो कभी विलुप्त नदी
कभी कभी तो यह ओयसिस बन जाता है
और कभी
धीर स्थिर सागर सा बन
यह
मेरे तन को शीतल कर देता है |
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