07 June
2015
20:58
-इंदु बाला
सिंह
दिन
की बरसाती छुट्टियां हों
या
रात्रि का
सन्नाटा
मन की
चिरयिया चहकती है कमरे में
फुदकती है घर
की छत पे
फिर
उड़ जाती है
अपनों की
मुंडेर पे
मित्रों के
घर के वृक्षों पे
जा बैठती है
कितनी अद्भुत
और
अजूबी है
यह चिरयिया
कभी कभी तो
यह सागर फलांग साइबेरिया पहुंच जाती है
पर
जहां भी जाये
यह लौट आती
है
अपने घर में
एक
नियत समय में |
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